मंगलवार, 7 दिसंबर 2021

298-प्रश्न

 

प्रश्न- बीना जोशी हर्षिता

 

महामारी,लॉकडाउन और


ऑनलाइन मुलाकातों के सिलसिले! 

स्नेह का स्रोत-सा,

मन के धरातल पर

अकस्मात् प्रस्फुटित होता है

और प्रेम की नन्ही- सी धार

निकलकर धीरे- धीरे बते हुए

एक विशाल नदी का

आकार ले लेती है।

हम दोनों के बीच

बहने वाली यह प्रेम-नदी

दो शहरों के तटबंधों को तोड़कर

सुदूर तुम्हारे घर तक जा पहुँचती है

और धकियाते  हुए

सभी रक्त-संबंधों

परिचितों एवं मित्रों को

तुम्हें अपने ही

आगोश में डुबो लेती है।

अपनेपन के मोह में उलझा

यह कोई पुराना नाता है,

 या इसी जन्म का रिश्ता?

 मेरी जिज्ञासा अकसर

 मुझसे प्रश्न करती है।

-0-6/12/2021

19 टिप्‍पणियां:

  1. प्रेम की अभिभूत करने वाली कविता, गहन आत्मीयता से सराबोर। हार्दिक बधाई बीना जोशी हर्षिता जी

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  2. बेहतरीन कविता, हार्दिक शुभकामनाएँ ।

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  3. प्रेम की अनुभूति की गहन व्यंजना।सुंदर कविता हेतु बीना जोशी'हर्षिता'जी को बहुत बहुत बधाई।

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  4. बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति।

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  5. बहुत सुंदर कविता।हार्दिक बधाई।

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  6. बहुत प्यारी रचना.हार्दिक बधाई.

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  7. प्रेम की प्यारी अभिव्यक्ति है | हार्दिक बधाई |

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  8. आपकी लिखी रचना  ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" रविवार 12 दिसम्बर 2021 को साझा की गयी है....
    पाँच लिंकों का आनन्द पर
    आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  9. जहाँ तक मुझे लगता है कि अपने जीवन में हैम जिससे भी मिलते हैं उससे कोई न कोई पुराना नाता होता है ।
    सुंदर अभिव्यक्ति ।।

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  10. नेह स्नेह की सुंदर अभिव्यक्ति।
    दूर पास का अंतर नहीं पड़ता बस अभिव्यक्त करना जरूरी है।

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  11. अपनेपन के मोह में उलझा
    यह कोई पुराना नाता है,
    या इसी जन्म का रिश्ता?
    मेरी जिज्ञासा अकसर
    मुझसे प्रश्न करती है।/////
    इस प्रश्न का अनुत्तरित रह जाना ही जीवन का असीम आनंद है | अपनत्व की परिभाषा तलाशती भावपूर्ण रचना | हार्दिक शुभकामनाएं शैल जी |

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  12. बढ़िया रचना ... हार्दिक बधाबीना जी।

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