शनिवार, 22 मई 2021

240-हिमालय

         भगत सिंह राणा 'हिमाद '


प्राची से  पश्चिमांचल तक तेरी 

फैली  विस्तृत  पर्वत   माला है  


उच्च  हिमालय  भारत  माँ का 

उत्तर  सीमा   का  रखवाला  है  


प्राण दान जन जीवन को देतीं

असंख्य सरिताओं की माला है  

नत मस्तक हे नगाधिराज तुम्हें ! 

जहाँ बद्री औ केदार शिवाला है  


चमकता  है  मुकुट  भाल तेरा 

शिखरों पर जो हिम की वलया  

गंगा यमुना  अलका सरस्वती 

कण्ठसुरसरि कल-कल सलया  


पुण्य  धरा पर  पूजित वेदों  में 

औषधियों का भण्डारण करता  

हिम जल से सिंचित यह धरती 

हिन्द  महोदधि  भी जल भरता  


पुण्य  सरोवर  तुझमें ही बसते 

घने अरण्य देवदारु के पलते हैं  

तेरे ही मनोरम  घाटियों  में  

फल फूल  मनोहर  फलते  हैं  


शिव पारवती करते हिम क्रीड़ा 

कैलाश  मानसर  जग  शान  है  

हे  गिरी राज !  तेरे  ही  कारण 

भारत  की  जगत में पहचान है  

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11 टिप्‍पणियां:

  1. आप सभी विद्वत जनों का हार्दिक ासभासर

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  2. अति खूबसूरत श्रेष्ठ सृजन को नमन🙏

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  3. प्रकृति सौंदर्य का सुंदर चित्रण।

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  4. आप सभी आदरणीय जनों का हार्दिक आभार

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  5. बहुत सुन्दर हिमालय दर्शन 💐🙏

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  6. बहुत शानदार रचना हिमालय पर।

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  7. एक अच्छी रचना के लिए बहुत बधाई

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