शुक्रवार, 10 सितंबर 2021

274-नगाधिराज

 बेलीराम कनस्वाल

(भेट्टी, ग्यारह गौं,टिहरी गढ़वाल)

 


हे नगाधिराज तू
,

           भारत की ढाल च।

आसरु च तेरु ही,

            तू ही रक्षपाल च।।

 

गंगा जमुना जी कु मैती,

              बद्रीनाथ धाम च।

केदारनाथ  तेरा सिर्वाणा,

         तू पर्वतों की शान च।।

 

अडिग छै तु उत्तर मा,

            रुप बड़ू बिराट च ।

हे गिरी श्रेष्ठ हिमालै,

       तु भारतै की आस च।।

 

ऋषि मुन्यों की तपस्थली,

        शिवजी को निवास च।

लक्ष्य कोटि देवतों को,

             तेरे सांका वास च।।

 

मुंड मा जनु देश कू तु,

             मुकुट का समान च।

हे नगाधिराज त्वैक,

             शत शत प्रणाम च।।

 

लखि पखि बौण त्यारा,

        मीठी भौंण म्योळि की।

बुरांसि का फूल स्वाणा,

        चैत खुशबू फ्योंळी की।।

 

गाड गदन्यूं मा पाणि,

                 अमृत समान च।

हरीं भरीं धरती त्वैसि,

        तु हमुक तैं  वरदान च।

 

हे नगाधि राज त्वैक,

           शत-शत प्रणाम च।।२।।

गुरुवार, 9 सितंबर 2021

273-हिमालय -दिवस

 


नमन तुम्हें हे, शृंग हिमालय

विजय प्रकाश रतूड़ी


नमन तुम्हें हे, शृंग हिमालय। 

हर हर शिव के तुम नृत्यालय। 

पर्वत राज हे, देवालय। 

जीवन दाता सत्य शिवालय। 

नमन--

धवलेश्वर हिमाच्छादित। 

धवल मणि से सदा जडित। 

जननी के मस्तक पर सज्जित। 

गिरि राज संज्ञा परिभाषित। 

प्रातः संध्या के अरुणालय। 

नमन--

जननी गंगा जीवन दाता। 

निकसे तुमसे यमुना माता। 

पावन तोय प्रवाहित जिसमें। 

जो अमृत के सम कहलाता। 

भारत मां के तुम रक्षालय। 

नमन - - 

आज्ञा तेरी माने सरिता। 

जिसका वारि अविरल बहता। 

खेत को पानी प्यासे को जल। 

और उदधि का पेट है भरता। 

तुम जलदों के शीतालय। 

नमन - - 

अविचल हो तुम सदा अडिग हो। 

औषधि में तुम संजीवन हो।। 

अंबर से संवाद तुम्हारा। 

प्रतीक सत्य के सदा धवल हो। 

ऋषि मुनियों के तुम शरणालय। 


नमन तुम्हें हे, शृंग हिमालय।।

272-एक सवेरे की तलाश

 डॉ.कविता भट्ट 'शैलपुत्री'   


सोमवार, 6 सितंबर 2021

271-हिन्दी साहित्य का विलक्षण पुरोधा:रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

 

ज्योत्स्ना प्रदीप

9 सितम्ब, 2013 की एक दोपहर, उस दिन फ़ोन की वो एक घंटी मेरे लिए माँ सरस्वती के किसी


मंदिर के पुजारी की आह्लादित घंटी से कम मधुर न थी
, जो साधकों को स्तुति-गान के लिए अनायास ही आमंत्रित कर देती है और साधक तेज़ कदमों से देवालय की ओर बढ़ने लगते हैं।

मेरे फ़ोन उठाते ही दूसरी ओर से  एक शान्त, गंभीर और सधा हुआ  स्वर  उभरा,"बहन ! मैं  रामेश्वर काम्बोज हिमांशु बोल रहा हूँ,आप ज्योत्स्ना प्रदीप है न! 'उर्वरा' हाइकु संकलन मेरे सामने है मैंने उसमे आपके हाइकु  पढ़े ....

रामेश्वर काम्बोज हिमांशु’, इस साहित्य-मनीषी का  नाम  मैंने  बहुत सुना था,अब आवाज़ भी सुन ली थी। मैं विस्मयाभिभूत थी, हर्षातिरेक से आँखें नम हो गईं, उनके उदार हृदय से निकला हर शब्द मुझे प्रोत्साहित कर रहा था, उनका मनोबल बढ़ाने वाला  अंदाज़ औरों से बड़ा अलग लगा । उनके मुख से निकली प्रशंसा मेरी नवीन भावनाओं की अनुशंसा बन गई थी।

माँ शारदे का यह पुत्र  हिन्दी साहित्य की अनवरत यात्रा पर  निकला हुआ थासाधकों और श्रद्धालुओं की इस भीड़ में उस दिन से उन्होंने मुझे भी शामिल कर लिया। मैं उन दिनों केन्द्रीय विद्यालय जालंधर में अंग्रेज़ी की टी.जी.टी अध्यापिका के पद पर कार्यरत थी।

उस दिन के पश्चात उनसे फ़ोन पर ही साहित्यिक चर्चाएँ होने लगीं । मैं क्षणिकाएँ,गीत, बालगीत और हाइकु बहुत वर्षों से लिख रही थी, पर अब इन विधाओं में ऊर्जा का नव-संचार होने लगा। हिमांशु जी गुरु की भाँति ऑनलाइन ही साहित्यिक विधाएँ जिज्ञासु रचनाकारों को सिखाते थे। मुझे भी उनका मार्गदर्शन मिलने लगा। भारत में जापानी विधाओं के भिन्न-भिन्न पुष्प जैसे हाइकु, ताँका सेदोका, चोका, हाइगा, हाइबन की सुगंध को चहुँ ओर फैलाने का कार्य वो बड़े ही ज़ोर-शोर से  कर रहे थे, उन्होंने इस उर्वरक कार्य में मुझे भी सम्मिलित कर लिया। अन्य विधाओं के लिए भी वे सभी का मनोबल बढ़ाते थे, मेरा भी बढ़ाने लगे । माहिया विधा के विकास के लिए उन्होंने दिन-रात अत्यधिक परिश्रम किया। पंजाब की इस सुन्दर विधा के लिए  उनका श्रम पूजनीय व अनुकरणीय है। माहिया की पहली सम्पादित पुस्तक पीर का दरियाका प्रकाशन भी उनका एक अनूठा कार्य है। ये सारा कार्य ऑनलाइन होता रहा। यहाँ ये इंगित करना अत्यावश्यक है कि ये केन्द्रीय विद्यालय के प्राचार्य के रूप में भी विद्यार्थियों को नई दिशा की ओर अग्रसर करते रहते थे और आज तक  भी नवांकुरों व जिज्ञासु रचनाकारों को सिखाने का ही शुभ कार्य कर रहे हैं ।

माँ शारदे की जगमगाती साहित्य की माला के लिए न-न साधकरूपी मोतियों को चुनना और पुराने मोतियों की आभा को भी सँजो रखना इनकी साधना का ही एक भाग है।

निःस्वार्थ होकर पर-कल्याण करने वाले लोग आज के युग में मिलने दुर्लभ हैं। ऐसे सुन्दर  संस्कार निःसन्देह इन्हें अपने माता -पिता से ही मिले हैं, ये इनकी सुन्दर रचनाएँ पढ़कर हर पाठक को ज्ञात हो ही जाता है।

रामेश्वर काम्बोज हिमांशु जी से  मिलने का सौभाग्य मुझे 10 जनवरी 2016 की दिल्ली के प्रगति मैदान में मिला मैं अपनी बेटी के साथ पुस्तक मेले में पहुँची। वहाँ बहुत भीड़ थी। हम उन्हें मोबाइल के माध्यम से ढूँढ ही रहे थे कि तभी किताबों से भरा एक बड़ा झोला लिये वे हमारी ओर बढ़ते दिखाई दिए-लम्बा, क़द, भरा,पावन चेहरा साथ ही उनके उजले मन की स्वर्णिम किरणें उनके नेत्रों में पावन उत्सव मना रहीं  थीं। मैं और मेरी बिटिया उनके  पाँवों की ओर झुके ही थे कि वे बोले,"  बहन ! आप मेरी अनुजा हो, बहन और भाँजी कब से  पाँव छूने लगीं? उन्होंने अपना हाथ मेरे और मेरी बेटी के सर पर  रखते हुए आशीर्वाद दिया। जिस आत्मीयता और स्नेह से उन्होंने मुझे बहन कहा, हृदय को छू गया! लगभग 39 पुस्तकों का प्रबुद्ध सम्पादक, अनेक विधाओं में लिखने वाला अति कोमल-हृदय का कवि, जापानी विधाओं को भारत में नवीन आभरण  पहनाने वाले अनुपम सर्जक और सुन्दर  लघुकथाएँ लिखने वाला  महान लेखक का व्यवहार कितना सहज और सरल था! ऐसे महान व्यक्ति का आशीर्वाद पाकर मैं कृतार्थ हो गईं !

उत्तर प्रदेश में भाईदूज पर बहनें  अपने भाई के लिए बेरी के पेड़  की पूजा करती हैं। बेरी के कटीले वृक्ष  की उस टहनी की पूजा करती हैं, जिसमे हरे-भरे त्रिदल लगे हों। ये तीन पत्तियाँ- महासरस्वती, महालक्ष्मी  और महाकाली का रूप हैं। इनका पूजन  जीवन के कंटकों से भाइयों को बचाता हैं। काँटों से बचाते हुए, हर एक भाई के लिए टहनी पर लगे त्रिदल को संयुक्त कर,उजली रुई से लपेटकर बाँधा जाता है । उसके बाद व्रती बहनें बेरी तले दीप जलाकर,नैवेद्य  समर्पित करते हुए भाई के सुन्दर भविष्य के लिए उपासना करती हैं।

हिमांशुजी से मिलने के बाद जब अगला भाई दूज का पर्व आया, तो अपने सगे भाइयों के अलावा एक और नया हरा-भरा त्रिदल चुन लिया था मैंने उनके सुखद भविष्य के लिए!

यूँ तो हिमांशुजी कई वर्षों  से लिख रहे  थे; परन्तु सन 2008 में केन्द्रीय विद्यालय के प्राचार्य पद से निवृत्त होने के बाद  निरन्तर साहित्य साधना करना ही इनके जीवन का ध्येय रहा।

इन्होंने  हिन्दी साहित्य को अनेक अद्भुत पुस्तकें प्रदान की हैं -जैसे - माटी,पानी और हवा,अँजुरी भर आसीस, कुकड़ू कू, मेरे सात जनम,झरे हरसिंगार, धरती के आँसू, दीपा, दूसरा सवेरा, मिले किनारे, असभ्य नगर, खूँटी पर टँगी आत्मा, भाषा- चंद्रिका, फुलिया और मुनिया, झरना, सोनमछरिया, कुआँ, रोचक बाल कथाएँ, लोकल कवि का चक्कर, माटी की नाव,बनजारा मन,तुम सर्दी की धूप, मैं घर लौटा, बंद कर लो द्वार आदि। इनकी कुछ पुस्तकों का अंग्रेज़ीउड़िया और पंजाबी में भी अनुवाद हुआ है। 

शिमला के अंग्रेज़ी  एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ. कुँवर दिनेश सिंह जो ख़ुद एक जाने -माने लेखक हैं। उन्होंने हिमांशु जी के काव्य पर  मंत्रमुग्ध होकर एक पुस्तक सम्पादित की है - 'काव्य- यात्रा': (रामेश्वर काम्बोज हिमांशु के काव्य का अनुशीलन )। यह  हिमांशु जी के 

काव्य पर आधारित एक प्रेरणास्पद उत्कृष्ट पुस्तक है।

उत्तराखंड के हे न ब ग केंद्रीय विश्वविद्यालय में सेवारत डॉ. कविता भट्ट शैलपुत्री  एक विदुषी महिला, जो  चर्चित लेखिका व सम्पादिका भी हैं, उन्होंने भी हिमांशु जी के गद्य अनुशीलन को केंद्रित करते हुए 'गद्य-तरंग' नामक पुस्तक सम्पादित की है।

 निःसन्देह रामेश्वर काम्बोज हिमांशु  हिन्दी साहित्य के विलक्षण पुरोधा हैं।

 

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रविवार, 5 सितंबर 2021

270-शिक्षक

 

अंकुर सिंह

 

 

प्रणाम उस मानुष तन को,

ज्ञान जिससे हमने पाया।

माता पिता के बाद हमपर

उनकी है प्रेम मधुर छाया।।

 

नमन करता उन गुरुवर को,

शिक्षा दें मुझे सफल बनाया।।

अच्छे  बुरे  का  फर्क  बता,

उन्नति का सफल मार्ग दिखाया।।

 

शिक्षक अध्यापक गुरु जैसे,

नाम अनेकों मानुष तन के,

कभी भय, कभी प्यार जता,

हमें जीवन की राह दिखाते।।

 

कभी भय, कभी फटकार कर,

कुम्हार भाँति रोज़ पकाते।

लगन और अथक मेहनत से,

शिक्षक हमें सर्वश्रेष्ठ बनाते।

 

कहलाते है शिक्षक जग में,

बह्म, विष्णु, महेश से महान।

मिली शिक्षक से  शिक्षा हमें

जग में दिलाती खूब सम्मान।।

 

शिक्षा बिना तो मानव जीवन,

पशु -सा, पीड़ित और बेकार।

गुरुवर ने हमें शिक्षा देकर,

हमपर किया है बहुत उपकार।।

 

अपने शिष्य को सफल देख,

प्रफुल्लित होता शिक्षक मन।

अपने गुणिजन गुरुवर को मैं,

अर्पित  करता  श्रद्धा सुमन।।

 

अंकुर सिंह

हरदासीपुर, चंदवक ,जौनपुर, उ. प्र. -222129.

ankur3ab@gmail.com

गुरुवार, 26 अगस्त 2021

268

 हाइकु -जगत् की एक और उपलब्धि , जिसके ऊपर हम सब गर्व कर सकते हैंं। कत्थक नृत्यांगना उर्वि सुकि ने  नदी विषय पर कत्थक  करने के लिए जब प्रयोग करना चाहा तो उन्हें हाइकु पसन्द आए।  नेट से हाइकु मिले तो मेरे । नदी के उन्हीं हाइकु पर हरिप्रसाद चौरसिया के बाँसुरीवादन के ट्रेक का अनुपालन करते हुए नृत्य किया।  इस प्रसंग ने यह भी सिद्ध कर दिया कि हाइकु-रचना एक साधना है, कोई खेल नहीं।




मंगलवार, 17 अगस्त 2021

266-नीलाम्बरा

                           डॉ.कविता भट्ट 'शैलपुत्री    

 निम्नलिखित लिंक पर नीलाम्बरा पढ़िए-एक -एक पन्ना पलटकर , डाउनलोड भी कर सकते हैं-

नीलाम्बरा-इन्द्रधनुष जुलाई _दिसम्बर 21

सोमवार, 9 अगस्त 2021

264-हाइकु नृत्य


Poem- 

Poet-


Kum. Urvi Suki 

A Dancer, and an Actor, Urvi is molded under the guidance of Guru Pranita Sawant and Guru Ranjana Phadke in Indian Classical Dance form - Kathak for the past 17 years.She has acquired the degree of Kathak Nritya Alankar from Akhil Bharatiya Gandharva Mahavidyalay,  Miraj. She is an Economics Graduate from Ramnarain Ruia College, and has acquired Diploma in Cyber Law under Asian School of Cyber Law. She has recently completed her Master's in Kathak dance and stood first in Tilak Maharashtra vidyapith.


 She is recruited as a Kathak Dancer in Western Railways and  also working in the Personnel  Department of Western Railway as a Staff Welfare Inspector. She has represented India at the BRICS Cultural (Dance…

 मित्रो! हर्षित हूँ कि अनेक सम्मानों से सम्मानित और अंतरराष्ट्रीय तथा राष्ट्रीय मंचों पर प्रस्तुति दी चुकी एवं पश्चिमी रेलवे में सेवारत  महाराष्ट्र की सुप्रतिष्ठित कत्थक नृत्यांगना Urvi Prajakta Shivram जी ने मेरे द्वारा लिखित 'नदी' विषय पर केन्द्रित हाइकु कत्थक नृत्य शैली में प्रस्तुत किये; जिसे संगीतबद्ध किया है प्रसिद्ध बाँसुरीवादक पं० हरिप्रसाद चौरसिया जी ने ...। प्रिय उर्वि जी को इस महत्त्वपूर्ण कार्य एवं प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई, साधुवाद और भविष्य हेतु सप्रेम शुभकामनाएँ!                                                                                                                                                                                                   कविता भट्ट शैलपुत्री

263-सप्तस्वर

 डॉ.कविता भट्ट 'शैलपुत्री'



सोमवार, 2 अगस्त 2021

कर्मयोगी कलाम

 डॉ.कविता भट्ट 'शैलपुत्री' 

(कॉपीराइट होने के कारण इस लेख या लेख के अंश  का कोई भी व्यक्ति उपयोग नहीं कर सकता।)

















रविवार, 25 जुलाई 2021

263-श्रीदेव सुमन: क्रान्ति के अग्रदूत

 डॉ.कविता भट्ट 'शैलपुत्री'

 

मेरी दादी ने सुहागन होते हुए भी कभी माँग नहीं काढ़ी, न सिंदूर भरा; ना ही बिन्दी लगाई। उन्हें सज-सँवरकर  रहना पसन्द नहीं था; ऐसा बिल्कुल नहीं था। मेरे दादाजी एक अक्षम व्यक्ति या वे ऐसा नहीं चाहते थे; ऐसा भी नहीं था। सच तो यह था कि मेरी दादी मजबूरी में माँग न भर सकी; धीरे-धीरे उनके और गढ़वाल की टिहरी  रियासत की उनके ही जैसी राजशाही के अधीन रहने वाली अनेक महिलाओं की  यह नियति बन गयी थी। इस प्रथा का नाम था स्यूँदी-पाटी।

 स्यूँद गढ़वाली भाषा में माँग को कहा जाता है। स्यूँदी-पाटी प्रथा के अनुसार केवल रियासत की पटरानी ही माँग काढ़ने, भरने और बिंदी लगाने, सजने-सँवरने का अधिकार रखती थी। यह एक साधारण बात लग सकती है किसीको; क्योंकि आजकल की महिलाएँ इसे प्रोग्रेसिव होने से जोड़ती हैं। उस समय ऐसा नहीं था; महिलाएँ माँग भरना पसंद भी करती थी और यह सुहागन होने का प्रतीक होने के कारण शुभ माना जाता था। सुहागन स्त्रियाँ माँग भरने में हर्ष और सौभाग्य मानती थी। माँग न भर सकना अशुभ माना जाता था और वैधव्य से जोड़ा जाता थालेकिन तत्कालीन राजशाही का भय ऐसा करने नहीं देता था। देण-खेण और न जाने कितनी ही ऐसी अनेक जनमानस का उत्पीड़न करने वाली प्रथाएँ, कर और अत्याचार टिहरी रियासत की तत्कालीन जनता ने झेले।

 देण (राजा द्वारा जनता से अनाज उगाही)-खेण (राजा द्वारा जनता से गुलामों के समान काम करवाना) और न जाने ऐसे कितने कर राजा ने थोपे थे और बदले में जनता को मिलती थी  केवल पराधीनता और अथाह अत्याचार । भारतवर्ष 15 अगस्त, 1947 को ही अंग्रेजों से स्वतंत्र हो चुका था; लेकिन टिहरी राजशाही के अमानवीय उत्पीड़नों का साक्षी बनकर इतिहास के पन्नों पर खून के आँसुओं से अथाह पीड़ा की कहानी लिख रहा था।

 एक ऐसा व्यक्ति, जिसे राजा द्वारा अथाह पीड़ाएँ केवल इसलिए दी गई;  क्योंकि उस व्यक्ति ने इन अत्याचारों के विरुद्ध विद्रोह किया। राजा ने इन्हें लगभग 35 सेर (32.5 किलो ग्राम) की बेड़ियाँ  पहनाकर जेल में डाल दिया। सुमन ने  84 दिन तक भूख हड़ताल की। न टिहरी जेल के एक कक्ष में अभी भी ये बेड़ियाँ रखी हैं। बचपन में हम इन्हें देखने जाते थे; जब इन्हें सुमन के बलिदान दिवस पर सभी के लिए दर्शनार्थ रखा जाता था सुमन की मूर्ति के साथ।

 सुमन और कुछ अन्य अमर बलिदानी सपूतों के विद्रोहों  का ही परिणाम था कि कुछ समय बाद टिहरी रियासत राजशाही से मुक्त हुआ। भिलंगना और भागीरथी के तट पर बसा हुआ टिहरी शहर (जहाँ मेरा बचपन बीता)कई वर्ष पहले डूब चुका है; विकास के मानवनिर्मित जलाशय में (जिससे निर्मित विद्युत आज भारत के अनेक राज्यों को जगमग कर रही है); ऐसे ही प्रकाशपुंज के समान यह अमर बलिदानी स्वतंत्रता का जननायक श्रीदेव सुमन इतिहास के पन्नों में अमर हो गया। 25 जुलाई को श्रीदेव सुमन जी का बलिदान दिवस है। श्रीदेव तुम एक चिरसुरभित सुमन की भाँति हमेशा महकते रहोगे हमारे मन-मस्तिष्क में। तुम्हें हम जैसे कोटि-कोटि जन का  कोटिशः नमन। सुमन जैसे ही अनेक अमर देशभक्त जो इतिहास के पन्नों में कहीं गुम हो गए; किन्तु देश को स्वतंत्र करवाने में जिन्होंने अपना लहू बहा दिया, उन सभी के बलिदान से भारत का जन-जन कभी उऋण नहीं हो सकता।

 जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।

शनिवार, 24 जुलाई 2021

262-गुरु और शिक्षक

डॉ. कविता भट्ट  'शैलपुत्री'

 

गुरु होना और यान्त्रिक रूप से शिक्षक होना दोनों पर्याप्त रूप से भिन्न  हैं। इन दोनों शब्दों और पदों का प्रयोजन और अभिप्राय नितांत भिन्न है।

  गुरु अर्थात अंधकार या अज्ञान से प्रकाश या ज्ञान की ओर ले जाने वाला। गुरु ज्ञान देता है, शिक्षक शिक्षा देता है।  भारतीय परिदृश्य में ज्ञान नॉलेज नहीं है; यह पूरी तरह से शिक्षा भी नहीं कहा जा सकता। कैसे? आइए थोड़ा विस्तार से समझें।

 गुरु वही व्यक्ति हो सकता है; जो निर्विकार, निर्लोभ, निश्छल हो। अहंकार जिसे छू भी न सका हो। जो सुपात्र  शिष्य को 64 कलाओं में निपुण कर सके। साथ ही ब्रह्मविद्या या परा विद्या और अपराविद्या या लौकिक विद्या में पारंगत कर सके। आत्मज्ञानी ही सही अर्थ में गुरु हो सकता है।

  इस संदर्भ में में श्रीकृष्ण के गुरु महर्षि सांदीपनि का व्यक्तित्व और कृतित्व विशेष है। वे श्रीकृष्ण के साथ ही बलराम और सुदामा के भी गुरु थे। उन्होंने एक ओर श्रीकृष्ण को 64 कलाओं में निपुण किया तो दूसरी ओर सुदामा जैसे अकिंचन को भी समभाव से ज्ञान का प्रकाश प्रदान किया। गुरु वे होते हैं जो सुपात्र शिष्य को परा और अपरा विद्या प्रदान करें।

 भारतीय दर्शन, सभ्यता और संस्कृति के सन्दर्भ में, परा विद्या से तात्पर्य स्वयं को जानने (आत्मज्ञान) या परम सत्य को जानने से है। उपनिषदों में इसे उच्चतम स्थान दिया गया है। वेदान्त कहता है कि जो आत्मज्ञान पा लेते हैं उन्हें मुक्ति या अपवर्ग या  कैवल्य की प्राप्ति होती है, वे दुःखों से मुक्त हो जाते हैं और ब्रह्म पद को प्राप्त होते हैं।

 मुण्डकोपनिषद में वर्णन प्राप्त है कि शौनक ने जब अंगिरस से पूछा, – "कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति"

 (महोदय, वह क्या है जिसके विज्ञात होने पर सब कुछ विज्ञात हो जाता है?)

 अंगिरस ने उत्तर दिया-

 द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद्ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च ।

तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति । अथ परा यया तदक्षरमधिग्म्यते ॥ - (मुण्डकोपनिषद्)

 

( दो प्रकार की विद्याएँ होतीं हैं जिन्हें ब्रह्मविदों ने बताया है,

 1-  परा विद्या 2- अपरा विद्या।

 परा विद्या-  जिसके द्वारा वह ब्रह्म  या 'अक्षर' (नष्ट न होने वाला) जाना जाता है।) इसका सम्बन्ध आत्म-साक्षात्कार, कैवल्य, मुक्ति, त्रिदुःख निवृत्ति से है।

 अपरा विद्या- इसके अंतर्गत ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्तं, छन्द और ज्योतिष आते हैं ।

 अपरा विद्या को परा विद्या के लिए मार्ग सुलभ बनाने का साधन कहा जा सकता है। इसका सम्बन्ध लौकिक जीवन को कुशलतापूर्वक व्यतीत करते हुए अंत में अपराविद्या तक मार्ग प्रशस्त करने से है। लेकिन यदि साधक या मनुष्य इसी में उलझ जाए तो वह परा विद्या या अक्षर तक नहीं पहुँच सकेगा।

 तथ्यपरक यह है कि शिक्षा देना अपरा विद्या का एक छोटा सा भाग है और शिक्षक उसे ही सम्पन्न करते हैं। इसलिए गुरु होना बहुत व्यापक अर्थ को लिए हुए है। शिक्षक और गुरु दोनों अलग-अलग प्रयोजन और अभिप्राय के द्योतक हैं ।

 शिक्षक शिक्षा देते हैं और व्यावहारिक ज्ञान अर्थात जितना भी आधुनिक शिक्षा के विभाग यथा-  व्यापारप्रबंधन, तकनीकि, चिकित्सा, गणित तथा विज्ञान इत्यादि हैं; ये सभी शिक्षा के अंतर्गत ही हैं। अब सोचिए शिक्षा आधुनिक जीवन में कितना व्यापक होने पर भी भारतीय वांग्मय के अनुसार कितना छोटा सा  स्थान रखता है मानव जीवन में।

 सार यह है कि शिक्षा का उद्देश्य आजकल अर्थोपार्जन के अतिरिक्त कुछ नहीं रह गया। व्यावसायिक अथवा अव्यावसायिक शिक्षा द्वारा व्यक्ति को मात्र अर्थोपार्जन या आजीविका या अच्छे सुख-सुविधायुक्त जीवन जीने के लिए तैयार किया जाता है।

 इसके लिए अच्छे वेतन पर शिक्षकों की व्यवस्था होती है। 

यह तो सीधी सी बात है कि वे ब्रह्मविद्या या परा विद्या तो नहीं दे सकते, अपरा विद्या को भी पूरा नहीं दे सकते और शिक्षा भी अपने शिष्यों को समान रूप से जीवन की 64 कलाओं में निपुण करते हुए भी प्रदान नहीं सकते; क्योंकि जीवन पद्धति परिवर्तित हो चुकी है। इसलिए यह सम्भव नहीं। एक कला में भी शिक्षार्थी को पूरी तरह निपुण कर दिया जाए तो तब भी शिक्षक धर्म पूर्ण होगा; क्योंकि शिक्षक को वेतन उतने के लिए ही दिया जा रहा है।

 

यहाँ यह भी समझना होगा कि यद्यपि शिक्षक वेतनभोगी हैं, तथापि प्रदत्त वेतन में यदि शिक्षक अपना कार्य निष्ठा से करें तो निश्चित रूप से शिक्षक भी गुरु के समान आदरणीय ही हैं; किन्तु इसके लिए प्रत्येक शिक्षक को आत्म-विश्लेषण की आवश्यकता है कि क्या वे अपना शिक्षण कार्य यथोचित ढंग से कर भी रहे है? अथवा केवल खानापूर्ति कर रहे हैं। निश्चित रूप से शिक्षक यदि यान्त्रिकता और आत्म-प्रवंचना से स्वयं को ऊपर उठाकर व्यापक दृष्टिकोण अपनायें तो वे श्रेष्ठ होंगे। अन्यथा वे मात्र एक यांत्रिक व्यवस्था का वेतनभोगी व्यक्ति से अधिक कुछ नहीं कहलाएँगे।

 शिक्षकों को गुरु के समान आदरणीय और पूजनीय होने के लिए महर्षि सांदीपनि जैसा समभाव अपनाना होगा। जो श्रीकृष्ण जैसे तेजस्वी और आर्थिक सम्पन्नता युक्त बालक और सुदामा जैसे अकिंचन के जीवनपथ को एक ही दृष्टिसम्पन्नता के साथ सुगम बना सकें। शिक्षकों के कर्त्तव्यबोध के अतिरिक्त इस हेतु आमूलचूल व्यवस्था-परिवर्तन की भी आवश्यकता है। यह शिक्षा में ही परिवर्तन लाएगा।

 सार यह है कि यह भी शिक्षक को गुरु नहीं बना सकता, किसी शिष्य विशेष की शिक्षक विशेष के प्रति आस्था एक अलग विषय है। हो सकता है कोई शिष्य किसी आदर्श शिक्षक को अपना गुरु मानता हो। यह एक व्यक्तिगत निष्ठा है।

 सार यह है कि यथोचित गुरु-शिष्य परंपरा चाहिए, तो पुनः गुरुकुल पद्धति की ओर जाने की आवश्यकता है। गुरु पूर्णिमा गुरु को समर्पित है, शिक्षक को समर्पित शिक्षक दिवस है।

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