मंगलवार, 28 जुलाई 2020

152-पत्थरों से लड़ी मैं


 डॉ.कविता भट्ट 'शैलपुत्री'


धड़कने बदलतीं  करवटें आजकल।   
 चाँद के भाल पर सलवटें आजकल।

यों तो अपना था वो मेरा, दोस्तों!     
महफिलों की जुबाँ नफ़रतें आजकल। 

आँखें हैं मौन , दिल भी खामोश है।
 देखो  सदमें में  गुरबतें आजकल।

 जिसे देखो वह रंग-रलियों में है।
 अब ना राँझे- सी   उल्फ़तें आजकल। 

पत्थरों से लड़ी मैं नदी की तरह।
उसकी सागर- सी हरक़तें आजकल।

बस समंदर ही था इक राहे- सफ़र।
नदी से उसे मोहब्बतें आजकल।

8 टिप्‍पणियां:

  1. पत्थरों से लड़ी मैं नदी की तरह क्या बात है बहुत सुंदर कविता की कविता जी बधाई

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  2. जिसे देखो वह रंग-रलियों में है।
    अब ना राँझे- सी उल्फ़तें आजकल। ...
    ~ sundar rachna

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  3. वाह!!!उत्कृष्ट सृजन दीदी जी।
    बेहतरीन।

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  4. बहुत सुन्दर। कथ्य में गहराई, भाव में गहराई।

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