शनिवार, 6 अक्तूबर 2018

83-पर्यावरण -क्षणिकाएँ


पर्यावरण -क्षणिकाएँ
डॉ.कविता भट्ट

1-वातानुकूलित प्रेमी

तुम वातानुकूलित प्रेमी
मैं नीलांचल की जलधारा
पर्वतों की गोद में
उन्मुक्त बहने का सुख
तुम क्या जानो
--
2-हे प्रिय!

हे प्रिय! मेरा यह जीवन
जेठ माह की पहाड़ी पगडण्डी-सा
जला दिया गया एक-एक वृक्ष
पोखर सूखे , धारे सूखे
मर गयी जिजीविषा
दूर-दूर तक पंथी पंछी
तुम मेरे संग चलना तो दूर
मुझे निहारना भी नहीं चाहते

3-आखिरी बुज़ुर्ग

आज हो रहा गाँव की
नवनिर्मित रोड का उद्घाटन
वहाँ अकेले रह रहा आखिरी बुजुर्ग
गाँव छोड़ रहा है
अनमना होकर
किन्तु समाप्त नहीं होता
हरे- भरे वृक्ष-खेतों का मोह
मटके का पानी,
मिट्टी की सौंधी महक
ठण्डी हवाएँ, फूलों की महक
नहीं है खुश ,गहरे दुःख में है
फिर भी जा रहा है दूर शहर
बहू-बेटे के साथ की खातिर
-0-
4-स्पर्श

विरहन के विरह-सा
दूषित-व्यथित पर्यावरण
चाहता है स्पर्श-
प्रेमी के समान
प्रेम में शर्त नहीं होती
यह तो देता है- जीवन
जैसे वृक्ष देते छाँव-हवा
नदी गाती है प्रवाह के सुर में
प्यास बुझाने वाले गीत
बिन किसी अनुबंध ही
--
(चित्र  गूगल से साभार )

9 टिप्‍पणियां:

  1. सभी क्षणिकाएँ मार्मिक। आखिरी बुजुर्ग दिल पर टीस छोड़ जाती है। पर्यावरण विनाश का डब्ड हम लगातार भुगत रहे हैं। फिर भी कुछ सीखने को तैयार नहीं।

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  2. Bahut bhavuk kar dene vali rachnayen hain aaj ki istithi ko bahut achche dhang se vykat kiya hai,meri bahut bahut badhai aapko.

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  3. कविता जी की क्षणिकायें अनमोल कल्पनाओं से विभूषित हैं | प्रकृति के चित्रों के साथ मानव जीवन का संघर्ष , सभी में व्यथा की कथा है | कवियत्री ने आखिरी बुजुर्ग की दशा अनेकों प्रवासी बुजुर्गों से है जो अपने देश ,गाँव और अपने पुराने मकान को छोडकर विदेशों में अपने बच्चों के दिखाए ये सर्स्ब्जों के लिए यहाँ आकर जीवन की ऎसी खाईं में गिर जाते हैं | बुजुर्ग का अंतिम सफर बहुत ही दुख पूर्ण है | कविता जी आपको बहुत सी बधाई ! श्याम त्रिपाठी हिन्दी चेतना

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  4. कविता तुम्हारी सभी क्षणिकाएँ हृदयस्पर्शी व सुन्दर हैं ।जीवन के बीच से चुने क्षणों से बुनी हैं ।बधाई ।

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  5. बहुत सुंदर , मर्मस्पर्शी क्षणिकाएँ । बधाई

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  6. जीवन की बड़ी मार्मिक तुलना की है आपने।बहुत ही सुंदर क्षणिकाएँ है।

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