मंगलवार, 4 सितंबर 2018

72-क्षणिकाएँ


डॉ.कविता भट्ट

1-अथाह प्रेम

उसने कहा
मुझे तुमसे अथाह प्रेम है
मैंने कहा-
तुम्हें यह प्रेम मुझसे है 
या स्वयं से !

2- कामनाएँ

 लहलहाती फसल-सी 
कामनाएँ उसकी
ओलावृष्टि- सी युग दृष्टि
विवश कृषक-सी वह
फिर भी चुनती 
ओलों को मोती -सा

6 टिप्‍पणियां:

  1. कम से कम शब्दों में भावों का पूरा संसार समेट लेना काव्य की सार्थकता है .कामनाओं का साम्य लहलहाती फसल से करना बहुत ही सार्थक उपमान का प्रयोग है .फसल पर जब ओलावृष्टि हो जाए , तब किसान की विवशता कितनी दर्दनाक होती है ,इसे भुक्तभोगी ही समझ सकता है . आपने इसको बहुत भावपूर्ण विधि से प्रस्तुत किया है !! हार्दिक बधाई

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  2. बहुत सुंदर सार्थक लेखन।

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  3. बहुत कुंछ कह दिया आपने इन क्षणिकाओं में। सुंदर सृजन, हार्दिक बधाई।

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  4. हार्दिक आभार आप सभी की समीक्षात्मक एवं आत्मीय टिप्पणियों हेतु।

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